Permanent Collection / Illustrated Reading Room
फ़साना-ए-आज़ाद
लखनऊ से रूम, फिर लखनऊ
लखनऊ के चौक में किसी ने चंदन के रंग पर भी पहरा बिठा रखा है। कहते हैं कि वही रंग पहनकर दूसरा आदमी निकला तो ख़ैर नहीं। अब मियाँ आज़ाद को यह बात बताने की देर थी। अगले दिन उनके जूते तक संदली थे।
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मूल उर्दू रचना · पंडित रतननाथ धर ‘सरशार’
मूल उर्दू कृति के प्रकाशक · मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ

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Read the 2026 Hindi adaptation chapter by chapter, or open any illustrated episode. The publication history and character portraits introduce Sarshar’s world.
कहानी के १६ अध्याय
- मियाँ आज़ाद का पता
- एक हज़ार रुपये का बटेर
- हुक्के की चिंगारी और आम की गुठली
- बजरे पर कौन बचा?
- हुस्नआरा की शर्त
- आग के उस पार
- मीडा की मुस्कान
- मीडा का लिफ़ाफ़ा
- क़ैदी का दोस्त
- शाहज़ादे की दो पहचानें
- घर की राह खुली
- लौटनेवाले को पहचानो
- सुरैया ने तस्वीर पहचान ली
- खोजी का भूला हुआ भाई
- हुस्नआरा ने धीरे से हामी भरी
- बैठक में आख़िरी मेहमान
दस किस्से चित्रों में
सरशार, प्रेस और ज़माना
The books
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सचित्र हिंदी संस्करण · ६६ पृष्ठ (PDF)
संदर्भ-पाठ · ६३० पृष्ठ (PDF) — उपलब्ध हिंदी पाठ के १११ प्रसंग और उपसंहार। मूल फ़ाइल की कुछ अक्षर-पहचान संबंधी अशुद्धियाँ इसमें बनी हुई हैं।